पंजाब में कांग्रेस की राजनीति में मची उथलपुथल का परिणाम क्या होगा?

पंजाब में फ़रवरी 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसी के मद्देनजर कांग्रेस आलाकमान ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री, तेजतर्रार नेता, कांग्रेस संगठन के गहरे जानकार भूपेश बघेल को चुनावों से दो साल पहले पंजाब का प्रभारी महासचिव 14 फरवरी 2025 को नियुक्त किया था। पंजाब में वर्तमान में भगवंत मान के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार सत्ता पर काबिज है, जिसके खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल है। वहां कांग्रेस पार्टी ही सबसे मज़बूत विपक्ष है जो सत्ता में आ सकती है पर वह कई गुटों में विभाजित है।

पूर्व मुख्यमंत्री श्री चरणजीत सिंह चन्नी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री अमरिंदर सिंह राजा वडिंग, नेता प्रतिपक्ष श्री प्रताप सिंह बाजवा, पूर्व उपमुख्यमंत्री श्री सुखजिंदर सिंह रंधावा के अपने खेमे हैं। इन्हीं सब को एकजुट कर पार्टी की चुनावी संभावनाओं को ऊंची उड़ान देने के लिए ही आलाकमान ने अपने अनुभवी चेहरे के रूप में भूपेश बघेल को वहां भेजा था। 

अभी वहां स्पष्ट रूप से दो खेमे सक्रिय हैं। एक गुट प्रदेशाध्यक्ष राजा वडिंग के साथ है और दूसरा गुट सांसद चरणजीत सिंह चन्नी के साथ है। भूपेश जी के लिए यही सबसे बड़ा सिरदर्द था कि इन्हें एक साथ कैसे लाया जाए। वैसे इनका रुझान राजा वडिंग की ओर ज्यादा था। शायद, यही बात दूसरे खेमे को चुभ गई और यहीं से आरपार का खेल शुरू हुआ। चन्नी खेमा किसी भी सूरत में राजा वडिंग को बदलवाना चाहता था पर प्रभारी इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे।

उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि यह गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं है। इससे तनाव बढ़ता गया, इस बीच आलाकमान ने चुनावों के मद्देनजर सभी गुटों को साधते हुए चुनावी समितियों की घोषणा की, ताकि जमीनी कार्यकर्ताओं तथा आम मतदाताओं में एकजुटता का संदेश जाए। दुर्भाग्य से शीर्ष नेतृत्व की यह पहल फलीभूत नहीं हो सकी। नेतृत्व परिवर्तन की मांग यथावत जारी रही।

इस बीच प्रदेश प्रभारी बघेल ने पांच दिनों के लिए पंजाब में ही डेरा डालकर मामले को सुलझाने का जतन किया पर अविश्वास का माहौल इतना गहरा हो चुका था कि कमान भूपेश जी के हाथों से निकल गई। 

राहुल गांधी के विदेश प्रवास से लौट कर आने पर आलाकमान ने पंजाब की उठापठक को गंभीरता से लेते हुए वहां के कुछ नेताओं तथा प्रदेश प्रभारी भूपेश जी को दिल्ली तलब कर लिया। सारे मुद्दों पर गहनता से विचार किया गया। पंजाब की राजनीति पर कई विश्लेषकों का मानना है कि वहां पार्टी हमेशा से गुटबाजी की शिकार रही है पर पार्टी की जड़ें वहां इतनी मज़बूत है कि किसी के पार्टी छोड़कर जाने का भी कांग्रेस की सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।

इस तथ्य को पंजाब कांग्रेस कर वर्तमान नेतृत्व भी भलीभांति समझता है इसीलिए लगभग स्पष्ट है कि वहां पार्टी में कोई विभाजन नहीं होगा, भाजपा की कांग्रेस को तोड़ने की मंशा पूरी नहीं होगी। प्रदेश कांग्रेस भी अपने में क्लियर है कि पंजाब में राहुल गांधी ही कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे हैं, चुनावी सफलता केवल राहुल जी की वजह से ही संभव है। 

मेरी अपनी राजनीतिक समझ है कि दिल्ली में पंजाब पर चली मैराथन बैठक के परिणाम अगले दो तीन दिनों में सामने आ जाएंगे। पंजाब के नेताओं को एकजुटता का साफ़ संदेश दिया जाएगा। किसी पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं होगी। नेतृत्व परिवर्तन शायद नहीं हो।

हालांकि, प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल जी को पंजाब से बाहर कर कर्नाटक या महाराष्ट्र का प्रभारी बनाया जा सकता है। जबकि कर्नाटक के प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला को पंजाब प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। मुझे इस पद पर एक हल्की संभावना छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के प्रभारी महासचिव सचिन पायलट की भी दिखती है। पंजाब से भूपेश जी की बिदाई तय दिखती है। 

(परमजीत बॉबी सलूजा का लेख)

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